Saturday, November 7, 2020

पनघट


घूंघट के पट से,पथिकन को देखत है।।

पिया के आने की, बाट जोहे जात है।।


जा नार-नवेली ,करत सखियन संग अठखेली।।

कबहुँ विचरत अकेली,चाल मतवाली चलत जात ।।


कंगना की खन-खन और पायल की छन-छन।।

वातावरण में ये हलचल सी करत जात।।


कुएं की उदासी को दूर करती चहल पहल।।

पनिहारिन पनघट पर अब न दिखात है।।


पथिक की पिपासा, कुएं ही मिटावत थे।।

कहाँ रहे पनघट,न पनिहारिन दिखात है।।


न कोनऊ गोपी दिखे, न ही दिखत राधिका।।

विचरत न कान्हा, न ही मटकी फोड़ी जात है।।


झटकत न चुनरी,न बहियां मरोड़त श्याम,

संस्कृति "बिसलरी" में सब विसरत जात है।।


🙏मधु शुभम पाण्डे🙏

No comments:

Post a Comment

बिहारी जी

 प्रीत है गहरी तुम संग प्रियतम, बढ़ती जाए हर पल हर छिन।। सगरी उमर मैं तुम पर हारूँ, चैन न आवे एक पल तुम बिन।। मधु शुभम पाण्डे✍️✍️