घूंघट के पट से,पथिकन को देखत है।।
पिया के आने की, बाट जोहे जात है।।
जा नार-नवेली ,करत सखियन संग अठखेली।।
कबहुँ विचरत अकेली,चाल मतवाली चलत जात ।।
कंगना की खन-खन और पायल की छन-छन।।
वातावरण में ये हलचल सी करत जात।।
कुएं की उदासी को दूर करती चहल पहल।।
पनिहारिन पनघट पर अब न दिखात है।।
पथिक की पिपासा, कुएं ही मिटावत थे।।
कहाँ रहे पनघट,न पनिहारिन दिखात है।।
न कोनऊ गोपी दिखे, न ही दिखत राधिका।।
विचरत न कान्हा, न ही मटकी फोड़ी जात है।।
झटकत न चुनरी,न बहियां मरोड़त श्याम,
संस्कृति "बिसलरी" में सब विसरत जात है।।
🙏मधु शुभम पाण्डे🙏
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