#पिछड़ती संस्कृति बिछड़ते संस्कार✍️
आज के भौतिकवादी युग में युवा पीढ़ी आधुनिकता की ओर आकर्षित हो रही है।
हमारी संस्कृति विलुप्त होती प्रतीत हो रही है।
भौतिक सुविधाओं ने जहां हमारा काम आसान किया है।
वहीं दूसरी ओर हमसे बहुत कुछ छीन भी लिया हैं।
भारतीय संस्कृति और संस्कार वर्तमान समय में पिछड़ते जा रहे हैं।
प्रतिस्पर्धा के इस युग में आज आगे निकलने की होड़ लगी हुई है।
जिससे युवाओं के भविष्य में विक्षोभ उत्पन्न होता दिखाई पड़ रहा है।
बदलती मानसिकता और परिवेश ने संस्कृति को अस्त व्यस्त कर दिया है।
जहाँ हमारा देश सदियों से अपनी अनूठी संस्कृति के लिए विश्व पटल पर माना जाता है। वहीं आज हम इस मामले में पिछड़ते जा रहे हैं।
भारतीय संस्कृति में आये अहितकारी बदलाव इसके संकेत देते हैं।
लोग पुरानी परम्पराओं को भुला कर नए रिवाजों को चलन में ला रहे हैं।जो हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए घातक हैं।
अनेकता में एकता के लिए विश्व विख्यात भारत आज धर्म के नाम पर विभाजित होता दिखाई पड़ रहा है।
हमारी एकता बिखरती जा रही है।
सिनेमा समाज का दर्पण होता है,ये बात आज स्प्ष्ट होती जा रही है।
पश्चिमी सभ्यता के प्रचलन में हम हमारी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।
हमारी युवा पीढ़ी पश्चिमी सभ्यता और सिनेमा को अपना आदर्श मान रही है।
निजी जीवन से लेकर विद्यालयों तक वही लाइफस्टाइल चल रहा है,जो सिनेमा जगत में चल रहा है।युवाओं का छुट्टी के बाद दोस्तों के साथ सड़कों पर गाड़ियों को दौड़ाना ,कहीं धूम्रपान करना ,अपशब्दों का प्रयोग करना ,अंग्रेजी भाषा और सभ्यता को ज्यादा महत्व देना।
कभी कभी देखने को मिलता है जब परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त होते हैं, तो आजकल के युवाओं की महफिलें सजती हैं जिसमें अंग्रेजी बोतलों का सहारा लिया जाता है। कम अंक आने पर भी दोस्तों का टोली बनाकर फिर उन्ही बोतलों के साथ सांत्वना देना।
पढ़ते पढ़ते छात्रों के जीवन में एक समय आता है।
जब वो कर्ज़दार हो जाते हैं।
पैसों के लेनदेन की वजह से गलत रास्तों को अपनाते हैं और एक दिन वो आता है जब कम उम्र में ही बड़े अपराधी बन जाते हैं।
गलत आदतों में लिप्त रहकर उनका मानसिक विकास नही हो पाता और फिर माता पिता का नाम रोशन करने के बजाय उन्हें दुःखी करते हैं।
"वसुधैव कुटुम्बकम" का भाव सदैव से भारतीय समाज का आधार माना गया है।समाज ने पूरी वसुधा को अपने परिवार की तरह माना है। समाज की बात तो छोड़ो आज तो सामूहिक परिवार भी कलह व्याप्त हैं।
परिवारों की एकता आज खत्म होती जा रही है। हम अपनी परम्पराओं और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।
हमें आज आवश्यकता है अपने बच्चों को हमारी संस्कृति के बारे में बताया जाए।उन्हें परम्पराओं और धर्म से जोड़ा जाए।
धार्मिक स्थलों में ले जाया जाए।धार्मिक कार्यों में शामिल किया जाए। अपनी मातृभाषा को महत्व देना सिखाएं। सभी भाषाओं का ज्ञान होना आवश्यक है,परन्तु मातृभाषा को विशेष दर्जा दिया जाए धर्म के प्रति सजग किया जाए।
अख़बार ,टीवी,इंटरनेट की यह जिम्मेदारी बनती है कि हमारी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा दें।
बॉलीवुड ने आज हमारी संस्कृति से हमें कोसों दूर कर दिया है।
बॉलीवुड से दूर अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक नृत्य,सांस्कृतिक कार्यक्रम दिखाए , ज्ञान और शिक्षाप्रद पुस्तकें पढ़ायें ज्यादा से ज्यादा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ले जाएं।
स्कूलों और कॉलेजों में भी हमारी भाषा और धर्म के बारे में बताया जाए शिक्षक और शिक्षा का सही महत्व समझाया जाए।
हमें पहनावे पर भी ध्यान देना होगा हमारे त्योहारों पर हमें भारतीय परिधान पहनने चाहिए।
भारतीय भोजन का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहेगा ।
जितना हो सके ज्यादा से ज्यादा पेड़ पौधे लगाएं बच्चों को भी पर्यावरण को शुद्ध रखने के सुझाव दे।
घर पर सब्जियों को उगाएँ।बच्चों को परिवार के साथ समय बिताने के लिए कहें जब आप परिवार में रहेंगे तभी अपने संस्कारों को जान पाएंगे। भारतीय खेलों को महत्व दें उनके साथ खेलें जिससे आपका और बच्चों दोनो का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।
कभी कभी छोटी सी बीमारियों में हमारे नुस्खे भी आजमाएं। योग करें।
त्यौहार परिवार के साथ मिलकर मनाएं। बच्चों को बुजुर्गों के पास रखें तभी अपनी परम्पराओं की जानकारी मिलेगी।।
प्रकृति और संस्कृति दोनो को बनाये रखें।।
मधु शुभम पाण्डे✍️
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