सबके लिए तुम हरपल हर लम्हा जीती हो।।
खुद के लिए कुछ पल तुम जी लिया करो।।
सबकी खुशियों की तुम रोज परवाह करती हो।।
अपने लिए खुल कर कभी मुस्कुरा लिया करो।।
नही है यहां किसी को तुम्हारे सपनों की परवाह।।
हक़ से कुछ सुनहरे सपने सजा लिया करो।।
लगे जब भी तुम्हे तुम कैद हो जिम्मेदारियों में।।
खुले आसमां में बांहे फैला तुम झूम लिया करो।।
तुम्हारे बिन अधूरी है ये दुनियां ये क़ायनात,
कभी कभी खुद पर ग़ुरूर कर लिया करो।।
नही हो तुम आम न खुद को कम समझो,
रिश्तों से परे स्त्री की ताकत को आंक लिया करो।।
तुम चाहो तो पलट दो पल में सारी क़ायनात,
ख़ुद को कभी दुर्गा,लक्ष्मी समझ लिया करो।।
स्वयं को कमज़ोर लाचार अबला न समझो,
गलत का मुँह तोड़ जबाब दे दिया करो।।
मधु शुभम पाण्डे✍️✍️